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Friday, February 9, 2018

Shrinath ji temple

Shrinath ji temple







Shrinath ji temple, the focal point of the town, is a place of worship dedicated to the younger representation of the Hindu God lord Krishna. The idol of the presiding deity portrays him to be holding his left hand out, raised high over his head, whereas right hand is curled into a fist placed by his side. The whole posture symbolizes the tale where Lord Krishna lifted the Govardhan hill to save people from the wrath of Lord Indra.

According to a legend, the idol of Shrinath ji, as the Lord is called here, had emerged from a huge black stone on the Govardhan hills (Mathura) in CE 1490-1495. Since then, the lord was worshipped on the place of his self-manifestation till 1672 A.D., when the idol was finally sent to Agra on the commands of Aurangzeb. Six months later, the idol was transferred to Rana Raj Singh of Mewar, but amid the way the chariot that was carrying the idol got stuck near Banas river in the village named Sinhad. Deeming it to be a sign from the Lord himself, the priests concluded that the idol should be placed on the spot, and a new temple should be built right there.

Accordingly, a temple was built by the Rana and was named ‘Shrinath ji ki Haveli’ or townhouse of revered Shrinath. Made of pure marble, the architecture of the temple was quite simple yet praiseworthy. Its interiors were adorned with the signature Pichhwai paintings depicting the ubiquitous theme of Rasleela.

Now, though, the grand structure of the temple is anything but simple. The multi-floored complex is built to accommodate the growing number of devotees visiting the shrine of their esteemed deity. In fact, as much as 63 extension plans are still in progress.

The temple, from the very beginning has attracted ardent devotees from around the nation, and soon a holy township was established around it. Later the town became known as Nathdwara signifying that it is the entryway to the much revered temple. The town has now become synonymous of golden Pichhwai art and Haweli music, both the products of the people’s devotion that they towards Lord Shrinath.

This pilgrimage of Rajasthan is accessible all year round, with special fair like celebrations organized on the festivals Holi, Diwali and Annakoota, when devotees from around the globe gather together to pay a visit to their venerated deity.

Daily Darshan Time

Mangla                 05:30am to 06:00am

Shringar               06:45am to 07:20am

Gwal                    09:00am to 09:15am

Rajbhog               11:15am to 12:10pm

Uthapan               03:45pm to 04:05pm

Bhog                    04:45pm to 05:00pm

Aarti                     05:15pm to 06:00pm

Shayan                07:00pm to 07:30pm



Nathdwara is a small town in the Indian state of Rajasthan. Situated at a distance of 48kms in the north-east of Udaipur, Nathdwara is sited on the right bank of Banas River. Nathdwara is famous for its 17th century temple that is dedicated to Lord Shrinathji (Lord Krishna). The term 'Nathdwara' suggests the 'gate of the lord'. Shrinathji Temple is also known as 'Haveli of Shrinathji' and makes a prominent pilgrimage of the Hindus / Vaishnavas. 

The temple has a story behind its establishment. According to the legend, the image of Lord Shrinath ji was enshrined in Vrindavan (land of Lord Krishna), but to protect the idol from the destructive rage of Aurangzeb. In 1672, Rana Raj Singh was the only gallant, who made an effort to rescue the idol from the domain of Aurangzeb. It is said that when the image was being shifted to an impervious place then at a particular place, the wheel of vehicle sank deep down in mud. The image refused to move further, so the escorting priest apprehended that this was Lord's chosen spot. Thus, a temple was built on the same spot. 

The structure of this temple is simple, but the aesthetic appeal of this temple is ceaseless. The image of Shrinathji is worth seeing and feeling the celestial beauty of the God. Lord Shrinathji symbolizes a form of Lord Krishna, when he lifted the 'Govardhana' (a hill). In the image, the lord is revealed with his left hand raised and the right is bunged in a fist. The idol is carved out of a large black stone. Images of two cows, a snake, a lion, two peacocks and a parrot by the god's head are imprinted on the idol. 

The temple authorities have not less than 500 cows and amongst them; one is regarded as Shrinathji's cow. It is considered that this cow has come from the pedigree that served the lord for centuries. Earlier, wagon-loads of food used to come here, which were said to be consigned by and consigned to Shrinathji. The holy shrine of Shrinathji is famous all over Rajasthan and India. People of Vaishnava community come in large numbers to visit this holy pilgrimage. 

During the times of Holi, Diwali and Janmashtmi, people throng in large numbers and the place gets overcrowded. Apart from festivals like Holi and Janmashtmi, Annakutta is a major festival that is celebrated in the temple with full gusto and fervor. A visit to this temple must be avoided during these days. Shrinathji Temple can be visited by only Hindus with an exception of foreigners. 

Nathdwara town is also famous as the Apollo of Mewar. In the town of Nathdwara, Shrinathji temple is the centre of attraction, but the town is also famous for its 'pichhwai' paintings, ivory articles and mouth-watering sweets. You can purchase articles from here as a souvenir of your religious trip to Shrinathji. One must visit this temple to feel the spiritual ecstasy and get the blessings of Lord Shrinathji.


 
द्वापर युग में जरासंध और कालयवन ने जिस प्रकार मथुरा पर आक्रमण कर दिया था और उससे बचकर भगवान् श्रीकृष्ण कुछ समय के लिये अन्यत्र चले गये थे एवं शांति होने पर पुनः व्रज लौट आये वैसा का वैसा लीला चरित्र नाथद्वारा में श्रीकृष्ण स्वरूप प्रभु श्रीनाथजी के साथ बना।
वि.स. १८३५ में अजमेर मेरवाड़ा के मेरो ने मेवाड पर भयानक आक्रमण किया तथा नृशंस हत्याएं करना प्रारंभ कर दिया। इधर पिंडारियों ने नाथद्वारा में घुसकर लूट खसोट की और धन-जन को हानि पहुँचाई। निरन्तर बढती हुई अशांति के बादल अभी छितरा भी नहीं पाये कि वि.स. १८५८ में दौलतराव सिन्धिया से पराजित होकर जसवन्तराव होल्कर यत्र तत्र भटकता हुआ मेवाड़ भूमि के समीप आ गया। परन्तु सिन्धिया की सेना उसे खोजती हुई नाथद्वारा आ पहुँची। अनवरत युद्धों की विभीषिका के मध्य भी नाथद्वारा का अनुपम वैभव देखकर उन्होने गोस्वामी जी से तीन लाख रूपया मांगा और व्यर्थ का श्रम देकर वसूलने का निरर्थक प्रयास किया। मंदिर की अचल संपति पर भी उसका मन मचल उठा और उसे भी हथियाने की चैष्ठाएँ की जाने लगी। आगत विकट स्थिति को भांपकर प्रभु श्रीनाथजी को सुरक्षित रखने के लिए गो.ति. श्री गिरिधरजी महाराज ने घसियार नामक वीहड़ में नाथद्वारा के समान ही मन्दिर बनवाना प्रारंभ कर दिया और नगर की संकटापन्न स्थिति के बारे में महाराज श्री ने वि.स. १८५७ आषाढ सुदी २ को मेवाड़ महाराणा श्री भीमसिंह को एक पत्र लिखा। प्रभु श्रीनाथजी एवं नगर का जन जीवन संकटग्रस्त देखकर गो.ति. श्री गिरिधर महाराज को मेवाड़ महाराणा ने श्री ठाकुर जी को उदयपुर पधारने की आज्ञा दे दी। भगवत् भक्त महाराणा ने त्वरित ही देलवाडा के राजा कल्याणसिंह झाला, कूंठवा के ठाकुर विजयसिंह जी चूंडावत सांगावत आगर्या के ठाकुर जगतसिंह जेत मालोत, मोई के जागीदार अजीतसिंह भाटी, शाह एकलिंगदास बोल्या तथा जमादार नाथूसिंह को सेना सहित नाथद्वारा की ओर रवाना किया। मेवाड़ की बहादुर सेना ने नाथद्वारा आकर घोर संग्राम किया तथा शत्रुओं को तितर-बितर कर दिया। गो.ति. श्री गिरिधरजी महाराज ने उदयपुर चले जाने में ही अपना हित समझा और वि.स. १८५८ माघ कश्ष्ण १ तद्‌नुसार दिनांक २९ जनवरी १९०२ को प्रभु श्रीनाथजी, श्री नवनीप्रियजी और विट्ठलनाथजी को रत्नालंकारों सहित लेकर महाराज श्री उदयपुर की ओर लेकर चल पडे़। कुछ ही समय में कोठारिया के रावत विजयसिंह चौहान उनके साथ हो लिये। इनका पहला पड़ाव उनवास नामक ग्राम में हुआ। वहां जब सुना की नाथद्वारा में होल्कर की सेना बडा उत्पात मचा रही है तब कोठारिया रावत नगर की रक्षार्थ नाथद्वारा लौट आये। यहां पर होल्कर की सेना ने उन्हे घेर लिया तथा शस्त्र एवं घोड़ा दे देने को विवश किया। कोठारिया रावत ने इसमें अपना अपमान समझा। उन्होने होल्कर की सेना से युद्ध ठान लिया और लड़ते- लड़ते वीरगति को प्राप्त किया।
प्रभु श्रीनाथजी उदयपुर की सीमा में आगे बढ़ने लगे। मेवाड महाराणा ने घसियार में प्रभु श्रीनाथजी व अन्य स्वरूपों की अगवानी की लेकिन उस समय तक घसियार का मंदिर निर्माणाधीन था। अतः मेवाड़ महाराणा प्रभु को लेकर उदयपुर पधारे।
उदयपुर में प्रभु का दिव्य स्वागत :- उस समय उदयपुर मेवाड़ की सुप्रसिद्ध राजधानी थी। भारत के वैभवशली नगरों में इसकी गणना होती थी। जिसके चारों ओर सुन्दर-सुन्दर जलाश्य थे। उनके किनारे हरे-भरे उपवन लहरा रहे थे। वृक्ष फल-फूलों से लदे हुए थे। उन पर विविध प्रकार के पक्षी कलरव कर रहे थे। हिरण चौकडी भरते स्पष्ट दिखाई देते थे। दूसरी ओर नगर की सम्पन्नता भी वर्णनातीत थी। बडी-बडी अटारियां ,बाजार, अन्न के गोदाम, घी तेल के कुंड ,सभा भवन, बडे-बडे गोपुर तथा चार दिवारियों से यह नगर अत्यन्त ही शोभा पर था। अस्तबल घोडो से भरे हुए थे तथा गज शाला में अनेक मदमस्त हाथी सुशोभित हो रहे थे।
जैसे ही प्रभु श्रीनाथजी के शुभागमन की चर्चा इस नगर में फैली वैसे ही राजप्रसादों के गगनचुम्बी शिखरों पर चमकते स्वर्ण कलशों को स्वच्छ कर दिया गया और उन पर विचित्र झांडियां फहरा दी गई। कितने ही दिनों पूर्व से ही नरनारियों ने प्रभु के आगमन की खुशी में घरबारों को लीपापोता तथा गृहद्वारों को आम्र तथा आशा पल्लवों से सजा दिया। नगर में बड़े-बड़े दरवाजे बनाये गये तथा रंग बिरंगी पताकाओं की सैकड़ो, वन्दनवारों से प्रधान मार्गो को सुशोभित कर दिया गया। नगर के राजपथ, गलियों और चौराहे झाड़ बुहारकर साफ कर दिये और उन पर निर्मल जल का छिड़काव कर दिया गया। प्रत्येक घर में उस दिन आनन्द का स्रोत फूट पड़ा। लोगो ने नई पौशके पहनी। जगह-जगह पर अगर धूप लगाकर नगर को महका दिया गया। अनेक नरनारी सजधज कर राजमार्ग में एकत्रित हो प्रभु श्रीनाथजी की बाट निहारने लगे। वर्तमान श्रीनाथजी मंदिर से लेकर राजमार्ग प्रमुख चौक और नगर से बाहर तक आपारन समूह लालायित था। सुहागिन नारियों ने किनारीदार कसुमल साड़ियों को पहिना, हाथो में कंकड तथा मंगलसूत्र से अपने आप को साजा लिया। पुरूष धोती, लम्बी अंगरखी पहिने हुये थे। उनके मस्तक पर रंग बिरंगी पगड़िया व मोठ़डे देखते ही बनते थे। ऐसे ही नौजवानों के सुगठित शरीर पर नाना प्रकार के उपरणे लहरा रहे थे उनमें भी कुछ लोगों ने अपने पैरों मे सोने के लंगर पहिन रखे थे। वृद्ध मनुष्यों की रजतधवल दाढ़ियां अत्यन्त ही गौरवान्वित हो रही थी। उस महोत्सव में सम्मिलित होने वाले अनेक रावराणा शोभायात्रा में यथावत् अपने-अपने स्थान पर खड़े थे जैसे ही प्रभु के आगमन का बिगुल बजा, सब लोग सतर्क हो गये और अपने हाथों में पुष्पगुच्छो को ले लिया।
महाराणा भीमसिंह पहले से ही श्रीनाथप्रभु के स्वागतार्थ नगर के प्रमुख द्वार पर खडे़ थे। शोभायात्रा के अग्रभाग में अश्व पर नगाढा बज रहा था। उसके पीछे हाथी पर उदयपुर महाराणा का निशान था और उसके पीछे कई सुसज्जित मदमाते हाथी अपनी अल्हड़ चाल से चल रहे थे। इनके पीछे सोने व चाँदी के आभूषणों से युक्त इठलाते घोड़े और इनके बाद महाराणा के अनेक शस्त्रधारी अद्वितीय योद्वा एक-एक कदम पंक्तिबद्ध बढा रहे थें। उदयपुर का प्रसिद्ध बाजा इस समय अपनी मधुर आवाज से सभी दर्शकों को आत्मविभोर किए हुए था। इसके पश्चात् गोपाल निशान को लिये ब्रजवासी अश्व पर सवार था। इनके पीछे गोस्वामी जी की सेना शनेःशने अपने कदम बढ़ा रही थी। इसके पश्चात् अरबी ताशे बजाने वालों का समूह बाजे बजाता चल रहा था। तदनन्तर छडी़दार ,समाधानी तथा मंदिर के अनेक कर्मचारी छडी़ लिए हुए आगे बढ रहे थें। इनके पीछे गोस्वामी बालक दिखलाई पड़ते थे। महाराज श्री गिरधरजी के मुख पर उस समय एक दिव्य चमक थी। गोस्वामी बालकों के साथ ही सच्चिदानन्द घन प्रभु श्रीनाथजी का अनुपम रथ चल रहा था और कईं सेवक उस पर चँवर आदि डुला रहे थे।
जैसे ही श्रीनाथजी का रथ महाराणा को दिखलाई पड़ा वे नतमस्तक हो गये। वे बार-बार प्रभु को वन्दन करने लगे। जय जयकार की तुमूल हर्ष की ध्वनी से सारा नगर निनादित हो उठा। महाराणा सही समय पर रथ के साथ सम्मिलित हो गये और स्वयं श्रीजी पर चँवर डुलाने लगे। श्रीजी के रथ के पीछे श्रीनवनीत प्रियजी और पीछे श्री विट्ठलेशरायजी के रथ चल रहे थे। इनके पीछे नाथद्वारा नगर की असंखय महिलाएँ चल रही थी। उनके धूल घुसरित मुखडे पर पसीने की बूंदे दिखलाई पड रही थी। उनमें से कई ने मस्तक पर टोकरे ले रखे थे। अनेको की गोदी में कई नन्हे-नन्हे बच्चे किल्लोल कर रहे थे। महिलाओं के बाद नाथद्वारा के कई संभ्रान्त नागरिक चल रहे थे। इनके बाद अनेक बैलगाडियाँ थी जिन पर सामान लदा हुआ था। शोभायात्रा में सबसे पीछे महाराज श्री के नगर रक्षक सांडनी सवारों की कतारे चौकन्नी होकर धीरे-धीरे आगे बढ रही थी। इस प्रकार ''श्री गिरिराज धरण की जय'' उद्गोष के साथ प्रभु का रथ अनवरत अग्रसर होता जा रहा था। सड़के, छते तथा दुकाने दर्शनार्थियों से खचाखच भरी थी। लोग जय जयकार करते हुए पुष्प् वर्षा कर रहे थे। ऐसे परमानन्दमय अवसर पर कुछ भक्त आँखों में प्रेमाश्रु बहाकर प्रभु का स्तवन करने लगे और कुछ आनन्दोन्मत होकर नाचने लग गये।
जैसे ही श्री गोवर्धन धरण प्रभु श्रीनाथजी का रथ राजप्रसाद के समीप पहुँचा, मेवाड की महारानियों ने प्रभु श्रीनाथजी का स्वागत किया। उस समय वे अद्भुत रूप लावण्य से सम्पन्न और बहुमूल्य वस्त्रालंकारों से सुसज्जित थी। राजमहिषी ने मुट्ठि भर-भरकर प्रभु के रथ पर मुद्राएं उछाली और रजत कनक पुष्पों की वर्षा की। इस प्रकार मन्थर गति से यह शोभायात्रा सात घंटो तक चलकर वर्तमान श्रीनाथजी मंदिर तक पहुँची । बडी़ धूमधाम के साथ रथ की आरती उतारी गई और रथ में ही श्रीकृष्णस्वरूप प्रभु श्रीनाथजी के दर्शन कराये गये। जिस समय प्रभु श्रीनाथजी के दर्शन खुले उस समय भक्तों में अपार अहाद देखते ही बनता था। प्रभु श्रीनाथजी के उदयपुर पहुँचने पर एक लघु मंदिर में प्रभु बिराजे। उसके बाद वहां भी नाथद्वारा के समान ही मंदिर का निर्माण कार्य कराया गया। श्री नवनीत प्रिय प्रभु श्रीनाथ प्रभु के साथ थे। श्री विट्ठलेशराय अपने अलग मंदिर में प्रतिष्ठापित हुए। प्रभु के साथ यहां फाल्गुन चैत्र, वैशाख, ज्येष्ठ, आषाढ़, श्रावण, भाद्रप्रद, आद्गिवन एवं कार्तिक के दीपावली व अन्नकूट आदि के उत्सव सम्पन्न किये। परन्तु सिन्धियां की सेना धीरे-धीरे बढते हुए यहां भी आ पहुँची। महाराणा भीमसिंह ने उसे पुनः लौट जाने तथा उदयपुर को कोई क्षति नहीं पहुँचाने के लिये कर रूप में अपनी राजरानियों के मूल्यवान हीरे-जवाहरात युक्त आभूषण भी दे दिये। ऊपर से तीन लाख रूपया और दिया। फिर भी उसकी अर्थ पिपासा शान्त नहीं हुई और उसने मेवाड की प्रजा को लूटा। महाराणा के शूखीर योद्वा उनसे भीड़ गये। देखते ही देखते युद्ध के प्रलयंकारी बादल दिखलाई पड़े । ऐसी विषमावस्था में प्रभु के निवास स्थान के लिये एकमात्र घसियार ही उपयुक्त स्थान दिखलाई पड़ा । उदयपुर में प्रभु श्रीनाथजी दस माह और नौ दिन बिराजे। तत्पश्चात् घसियार में सुदृढ़ दुर्गनुमा मंदिर बन जाने के बाद प्रभु श्रीनाथजी उस ओर रवाना हो गये।
घसियार प्रस्थान :- घसियार सुन्दर पर्वतीय उपत्यका में हरितिमा लिये हुए एक भयानक स्थान था। यकायक यहां किसी का पहुँचना सहज नही था तो दुभर अवश्य था। गो.ति. श्री गिरधरजी महाराज ने पन्द्रह लाख रूपया लगाकर जो प्रभु श्रीनाथजी का मंदिर बनवाया अब तो वह पूर्णरूपेण निर्मित हो चुका था। अतः प्रभु को वहीं पधराना उचित समझा गया। नन्दनन्दन प्रभु श्रीनाथजी अब घसियार पधारे और अपने दुर्गाकार मंदिर में बिराजमान हुए। देखते ही देखते घसियार नाथद्वारा हो गया। मंदिर के चारो ओर गली मोहल्ले तथा चौराहे बनने लगे। नित नये आनन्द व मनोरथों की वहां झडी लगने लग गई। जंगल में मंगल के नगाडे़ बज उठे।
घसियार से पुनः नाथद्वारा आगमन :- वहां घसियार का जलवायु सभी को अनुकूल नहीं हुआ। वहा का पहाड़ी पानी प्रभु श्रीनाथजी की सेवा योग्य नही था। यहाँ तक कि विपरित वातावरण से आचार्य ति. श्री गिरधरजी महाराज के तीन पुत्र कुछ ही वर्षो में परलोक सिधार गये। अतः महाराजश्री ने अपने चतुर्थ पुत्र श्री दाऊजी को प्रभु श्रीनाथजी के श्रीचरणों में डाल दिया। करूणावरूणालय प्रभु श्रीनाथजी ने तुरन्त ही अपना दायाँ श्रीहस्त दाऊजी के ऊपर रख दिया और अभय वर दिया। इसके साथ ही पुनः नाथद्वारा कूच करने की आज्ञा प्रदान की। इस प्रकार एक वर्ष उदयपुर और पांच वर्ष घसियार वास करने के पश्चात् वि.सं. १९६४ में प्रभु श्रीनाथजी दलबल सहित अनेक भक्तों को साथ लेकर युद्ध भूमि हल्दीघाटी के अरण्य मार्ग को पारकर खमनोर होते हुए नाथद्वारा आ पहुँचे। लेकिन श्री विट्ठलनाथजी प्रभु श्रीनाथजी संग नही पधारे। वे उदयपुर से सीधे वि.सं. १८५८ में कोटा पधार गये। जब गो.ति. श्री दाऊजी महाराज ने वि.सं. १८७८ में प्रभु श्रीनाथजी में द्वितीय सप्तस्वरूपोत्सव किया तब कोटा से पुनः श्री विट्ठलेशरायजी नाथद्वारा आये और अपने मंदिर में बिराजे तभी से अभी तक आप इस नगर को पावन किये हुए है।प्रभु श्रीनाथजी पुनः छः वर्षो बाद नाथद्वारा पधारे उस समय तक इस नगर की ऐसी दुर्दशा हो गई कि लोग अपने पुराने मकानों तक को नहीं पहचान सके। तिलकायत महाराज का भवन मात्र भग्नावशेष रह गया। परन्तु ऐसे समय में प्रभु श्रीनाथजी का जीर्ण शीर्ण मंदिर सभी भक्तों के लिए परम वंदनीय था। जिस दिन से प्रभु श्रीनाथजी ने पुनः पदार्पण किया। उसी दिन से अनवरत इस वसुधा पर सुधा वर्षण होने लगा है।
महाराणा भीमसिंह ने जब देखा कि प्रभु श्रीनाथजी आनन्दपूर्वक नाथद्वारा पधार गये है और पुनः उसी मंदिर में बिराजे है, उनका हृदय प्रसन्नता के मारे बाँसो उछल पड़ा। क्योकि प्रभु के घसियार वास करने से महाराणा काफी चिन्तित हो गये थे। अतः शुभवेला देख महाराणा भीमसिंह नाथद्वारा आये और प्रभु श्रीनाथजी के दर्शन कर गद् गद हो गये। इसके साथ ही श्रीजी में अनेक मनोरथ करवाकर सालोर, घसियार, व्याल, चेनपुरिया, चरवोटिया, भोजपुरिया, टांटोल, बाँसोल, होली, जीरण, देपुर छोटा, सिसोदिया, ब्राह्मणों का खेडा़ तथा माँडलगढ का मंदिर आदि गाँव प्रभु को भेंट कर प्रभु श्री गोवर्धनधरण श्रीनाथजी के प्रति अपनी अटूट श्रद्धाभक्ति का परिचय दिया।

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