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Friday, February 9, 2018

नाथद्वारा के श्रीनाथ मंदिर में भक्तों की भीड़ क्यों लगी रहती है?

उदयपुर से 50 किलामीटर दूर उदयपुर-अजमेर सड़क पर अन्यतम वैष्णव तीर्थ नाथद्वारा है। नाथद्वारा का शाब्दिक अर्थ श्रीनाथ जी का द्वार होता है। श्री कृष्ण यहां श्रीनाथ जी के नाम से विख्यात हैं। काले पत्थर की बनी श्रीनाथ जी की इस मूर्ति की स्थापना 1669 में की गई थी। वैष्णव पंथ का यह मंदिर शिर्डी स्थित सांईबाबा, तिरुपति स्थित बाला जी और मुंबई स्थित सिद्धी विनायक मंदिर जैसे ख्याति
 प्राप्त धनाढ्य मंदिरों की श्रेणी में आता है, जहां अनन्य श्रद्धाभाव के साथ दूर-दूर से भक्तजन दर्शन के लिए आते हैं।

यहां जन्माष्टमी, होली और दीवाली पर होने वाले विशेष आयोजनों में भक्तों का भारी हुजुम इकट्ठा होता है। इस स्थान की एक और विशेषता यह है कि श्रीनाथ जी का मंदिर और नाथद्वारा कस्बा दोनों की ही खूब ख्याति है। यह ख्याति उसी प्रकार है जैसे बाला जी के साथ तिरुपति की सांईबाबा के साथ शिर्डी की। यदि कोई नाथद्वारा जाने की बात कहता है तो समझ में आ जाता है कि वह श्रीनाथ जी के दर्शन करने जाने की बात कर रहा है।

तंग गलियों के बीच स्थित श्रीनाथ जी के इस मंदिर में और नाथद्वारा कस्बे में आखिर ऐसा क्या है कि लोग दूर-दूर से यहां आते हैं और श्रीनाथ जी के प्रति इतनी गहरी आस्था और श्रद्धाभाव रखते हैं। यह सब हो रहा है केवल वास्तु के कारण। यूं तो श्रीनाथ जी का मंदिर भारत के लगभग हर शहर में और दुनिया में कई जगह हैं, किन्तु श्रीनाथ जी के हर मंदिर में तो ऐसी भीड़ एकत्रित नहीं होती है जैसी नाथद्वारा के श्रीनाथ जी के मंदिर में? इसका एकमात्र कारण यह है कि जिन धर्मिक स्थलों की भौगोलिक स्थिति एवं बनावट वास्तु सिद्धान्तों के अनुकुल हो जाती है केवल वही स्थान विशेष प्रसिद्धि प्राप्त करते हैं, लोग वहां मन्नते मांगते हैं मन्नतें पूरी होने पर भारी चढ़ावा चढ़ाते हैं।

आईए देखते हैं कि श्रीनाथ जी और नाथद्वारा दोनों अपनी किन वास्तुनुकूलताओं के कारण प्रसिद्ध है -

एक ओर जहां उदयपुर से आते समय जहां से नाथद्वारा की सीमा प्रारम्भ होती है, वहीं से उत्तर दिशा की ओर तीखा ढलान है यह ढलान पूरे नाथद्वारा को पार करने के बाद कस्बे के दूसरी ओर बनास नदी तक चला गया है। नाथद्वारा की उत्तर दिशा में बहने वाली यह बनास नदी 480 किलोमीटर लम्बी राजस्थान की सबसे बड़ी नदी है जो पश्चिम से पूर्व दिशा की ओर बह रही है। ऐसी ही वास्तु स्थिति मदुरै शहर की भी है जहां प्रसिद्ध मीनाक्षी मंदिर है। मदुरै शहर की उत्तर दिशा में भी वैगे नदी पश्चिम से पूर्व दिशा की ओर बह रही है जो मदुरै शहर की प्रसिद्धि का कारण है। नाथद्वारा की दक्षिण दिशा के साथ-साथ पश्चिम दिशा वाला भाग भी ऊंचा है। पूरा कस्बा दक्षिण और पश्चिम दिशा में ऊंचा है और पूरे शहर की जमीन का ढलान उत्तर और पूर्व दिशा की ओर है।

श्रीनाथ जी का मंदिर नाथद्वारा के नैऋत्य कोण वाले भाग में स्थित है। श्रीनाथ जी के मंदिर परिसर का भी दक्षिण एवं पश्चिम भाग ऊंचा है और परिसर में क्रमानुसार पश्चिम दिशा से पूर्व दिशा की ओर तथा दक्षिण दिशा से उत्तर दिशा की ओर तीखा उतार है। इसी कारण वहां बने हॉल व कमरे एक के बाद एक सीढ़ीनुमा बने हैं। यही वास्तुनुकूल भौगोलिक स्थिति तिरुपति बालाजी और शिर्डी के सांई मंदिर में है।
 तिरुपति बालाजी में दक्षिण पश्चिम दिशा एवं नैऋत्य कोण में ऊंचाई तथा उत्तर, पूर्व दिशा तथा ईशान कोण में नीचाई के साथ ही पुष्करणी तालाब है। यहां एक अन्तर जरूर है कि, श्रीनाथ जी में पश्चिम दिशा में ऊंचाई है परन्तु तिरुपति बालाजी में पश्चिम दिशा में मंदिर परिसर से सटकर विशाल पहाड़ हैं। तिरुपति बालाजी में मंदिर परिसर के अन्दर ईशान कोण में पुष्करणी तालाब है जबकि श्रीनाथ जी मंदिर परिसर के बाहर थोड़ी दूरी पर ईशान कोण में एक बड़ा सिंहाड तालाब है। जहां तालाब के मध्य विश्वकर्मा जी का छोटा मंदिर भी बना हुआ है।

मंदिर परिसर के बाहर पूर्व दिशा में श्रीनाथ जी का खर्च भंडार भवन है। खर्च भंडार के बाहर उत्तर एवं पूर्व दिशा में ढलान है और भंडार के अन्दर श्रीनाथ जी मंदिर परिसर की तरह पश्चिम दिशा के कमरों का फर्श ऊंचे और पूर्व दिशा में बने कमरों का फर्श नीचा है। खर्च भंडार की पूर्व दिशा की इसी नीचाई के साथ-साथ पूर्व दिशा में चार बड़े घी के कुंए भी बने हुए हैं।

श्रीनाथजी मंदिर परिसर में तीन द्वार हैं एक द्वार उत्तर दिशा की ओर और दो द्वार पूर्व दिशा की ओर हैं। यह सभी द्वारा वास्तुनुकूल स्थिति में है। पूर्व दिशा की ओर स्थित दोनों द्वारों तक पहुंचने के लिए जो रास्ते हैं उनमें उत्तर दिशा की ओर घुमाव लिए हुए तीखा ढलान है। यह तो हुई श्रीनाथ जी एवं नाथद्वारा कस्बे की वास्तुनुकूलताएं जो इस स्थान की वैभव और प्रसिद्धि बढ़ाने में सहायक हो रही हैं लेकिन यहां चीनी वास्तुशास्त्र फेंगशुई का भी एक सिद्धांत भी लागू हो रहा है जो इनकी यश और प्रसिद्धि बढ़ाने में और अधिक सहायक हो रहा है जैसा जम्मू स्थित वैष्णोदेवी, उज्जैन का महाकालेश्वर मंदिर इत्यादि हैं।

फेंगशुई के सिद्धांत:
फेंगशुई का एक सिद्धांत है कि यदि पहाड़ के मध्य में कोई भवन बना हो जिसके पीछे पहाड़ की ऊंचाई हो आगे की तरफ पहाड़ की ढलान हो और ढलान के बाद पानी का झरना, कुण्ड, तालाब, नदी इत्यादि हो तो ऐसा भवन प्रसिद्धि पाता है और सदियों तक बना रहता है। फेंगशुई के इस सिद्धांत में दिशा का कोई महत्त्व नहीं है। ऐसा भवन किसी भी दिशा में हो सकता है। चाहे पूर्व दिशा ऊंची हो और पश्चिम में ढलान के बाद तालाब हो, इससे कोई फर्क नहीं पड़ता। नाथद्वारा में भी दक्षिण एवं पश्चिम दिशा में बहुत ऊंचाई है और उत्तर पूर्व दिशा की ओर तीखा ढलान है और ढलान के मध्य में श्रीनाथ मंदिर परिसर है। इस परिसर के बाद सिंहाड तालाब है और तालाब के बाद बनास नदी बह रही है। इसलिए यह कहना कि नाथद्वारा एवं श्रीनाथ जी का मंदिर परिसर वास्तु एवं फेंगशुई दोनों के सिद्धान्तों के अनुकुल होने के कारण ही इनको इतनी प्रसिद्धि मिली है, गलत नहीं होगा।

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